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"माया का हास्य और कर्मों का रुदन: विवशता के मार्ग पर चेतना की परीक्षा"

  🌌 अंधेरी रात का आह्वान (भाग 2) 📖 આ લેખ ગુજરાતીમાં વાંચો (Read in Gujarati) भाग 2: विवशता का मार्ग और अग्नि-परीक्षा अब मैं थोड़ा स्वस्थ हुआ। मैंने एक हाथ में दीपक जलाया और दूसरे हाथ में लाठी ली, और उस दिशा की ओर चल पड़ा। आवाज़ बहुत दूरी से आ रही थी, सड़कें विकराल थीं और हर कदम पर अनिश्चितता थी। मैं जानता था कि **"यह राह आखिरी भी हो सकती है और जीवन की शुरुआत भी।"** फिर मेरे लिए जीवन में आखिरी में बचा ही क्या था? मैं पसीने से स्नान कर रहा था; मेरे दिल की गहराइयों में एक डरावना खौफ़ था। लेकिन मैं अपने विचारों और आत्मा के सामने विवश नहीं था—बल्कि **समर्पित** था। मैं धीरे-धीरे उस दिशा में एक-एक कदम रख रहा था। **करुणा और माया का द्वंद्व** आवाज़ धीरे-धीरे स्पष्ट सुनाई देने लगी। आवाज़ में मिश्रण था: एक बूढ़ी औरत का करुण रुदन और छोटे-छोटे बालकों की चीखें। यह रुदन इतना भयानक और करुण था कि मेरी सारी विपत्तियाँ उसके सामने फीकी पड़ रही थीं।...

"अंधेरी रात का आह्वान: किसान से कर्मयोगी तक का पहला कदम"

  🌌 अंधेरी रात का आह्वान: जब चेतना ने कर्मयोगी को पुकारा भाग 1: अनिश्चितता की दस्तक (खेती से खोज की ओर) कुछ दिन पहले की बात है। जीवन में जब अघटित घटनाएँ घटती हैं, तो यह संकेत होता है कि एक नया मोड़ आने वाला है। मेरे साथ भी एक अघटित घटना घटी। **उसने पहले मुझे तोड़ा, फिर मोड़ा और अंततः जोड़ा।** मुझे लगा कि यह घटना मुझे मेरे मित्रों के साथ साझा करनी चाहिए। मैं एक ग़रीब किसान का बेटा हूँ और किसान होते हुए, रोज़िंदा खेती का कार्य करके परिवार का गुज़ारा चलाता था। उन दिनों मैं दुविधाओं और विपत्तियों से घेरा हुआ था; मेरे विचार अस्थिर थे और मेरा मन प्रकृति के खेल में भटक रहा था। मेरे लिए रात और दिन समान बन गया था: **घंटा कटता दिन में, दिन कटता वर्ष में।** **रात बनती युगों की, मुझ पर कौन खाए तरस?** जीवन में अंधेरा ही अंधेरा था, फिर भी मैं जीवित था—क्योंकि मेरे भीतर प्रकाशमय था। मैं चेतन बल पर अस्तित्व में था। मैं विपत्तियों की आग में जल रहा था। मैं ज़िंदी लाश की तरह जी र...

"प्रेम कि अदालत: चेतना से करुणा की अखंड धारा तक"

  💖 प्रेम, आसक्ति, स्वार्थ और परमात्मा “वैराग्य वह शक्ति है जिसमें मन वैभव, मोह और माया पर विजय पाकर असली स्वराज्य प्राप्त करता है।” 🔥 ॐ कार्मिक । आरंभ । 🔥 मैं कौन हूँ? मैं क्यों हूँ? - ख़ुद से पूछें ✍️ आत्मगुरु से जीवन दर्शन **ॐ सूत्र वाक्य:** “प्रेम जहाँ ख़ुद ख़ुद न रहे, वहीं सच्चे प्रेम का आरंभ बिंदु है।” यह वही अवस्था है जब मन और चेतना प्रेम के धागे में पिरोए जाते हैं, और काया उसी सुर में नृत्य करने लगती है। यहीं से उस 'प्रेम की अदालत' का मार्ग प्रशस्त होता है— "प्रेम की अदालत वह स्थान है, जहाँ ईश्वर भी मौन धारण कर लेता है।" यह लेख हमारी यात्रा है—यह समझने की कि कैसे चेतना से करुणा का निर्बाध प्रवाह मोक्ष की ओर बढ़ता है; उस भ्रम को भेदकर जहाँ हमने सदियों तक प्रेम को मोह समझा। १. प्रेम: चेतना का...

"आपके भीतर ही है सत्य: 'कुआँ और कीचड़' के दृष्टांत से आत्मज्ञान"

🔱 सत्य: सृष्टि की आत्मा और ब्रह्मांड का अटल चक्र सत्य ही अमरता का सेतु है—जो स्वयं न हिले, न टूटे, न बदले। 🔥 ॐ कार्मिक । आरंभ । 🔥 मैं कौन हूँ? मैं क्यों हूँ? - ख़ुद से पूछें ✍️ आत्मगुरु से जीवन दर्शन **ॐ सूत्र वाक्य:** “सत्य वह है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का आधार है — जो स्वयं न हिले, न टूटे, न बदले। जहाँ परिवर्तन समाप्त हो जाता है, वहीं सत्य का आरम्भ होता है।” सत्य (Satya) = स (सर्वभौम/शाश्वत) + त्य (अखंड तय) 🌀 सत्य: सृष्टि की आत्मा और अखंड पहचान सत्य (Satya) सृष्टि या ब्रह्मांड की **अटल जड़** तथा आत्मा है। आत्मा ही सत्य है, और सत्य कर्म ही मोक्ष का प्रारंभिक बिंदु है। सत्य समस्त शक्तियों की **अखंड पहचान** है। हर शक्ति **सत्य की मुहर (Satya Ki Mohar)** के बिना अधूरी है और अपना वास्तविक स्वरूप खो देती है। (उदाहरण के लिए: प्रेम तभी प्रेम है, जब इरादा नेक हो; अन्यथा, वह मात्र एक प्रेम का...

'आत्मविश्वास का अमरत्व, आत्मसम्मान की सीमा: काल से परे की शुद्ध शक्ति'

🛡️ आत्मविश्वास अहंकार में क्यों नहीं बदलता? भ्रम की छाया और मन का अटल तोड़   🔥 ॐ कार्मिक । आरंभ । 🔥 मैं कौन हूँ? मैं क्यों हूँ? - ख़ुद से पूछें ✍️ आत्मगुरु से जीवन दर्शन “चेतना का दीपक जलता है तो अहंकार का अंधकार मिटता है, और आत्मसम्मान–आत्मविश्वास स्वयं प्रकाशित हो उठते हैं।” 'आत्मविश्वास का अमरत्व, आत्मसम्मान की सीमा: काल से परे की शुद्ध शक्ति' [प्रस्तावना: भ्रम की छाया से सत्य की ओर] हम मनुष्य पीढ़ियों से एक **गहन भ्रम की छाया** में जी रहे हैं। हमने **आत्मविश्वास** और **अहंकार** को एक ही यात्रा के दो छोर मान लिया है, जहाँ एक के बाद दूसरा आना निश्चित है। किंतु, यह **अटल सत्य** है कि **आत्मविश्वास—जो स्वयं आत्मा और विश्वास का पवित्र मिलन है—वह कभी भी अहंकार में नहीं बदल सकता।** यह तो ईश्वर का शुद्ध प्रतीक और अमरता का द्वार है, जो हर अहम (Ego) के बंधन से मुक्त रहता है। वास्तविकता यह है कि **अहंकार ...

“अहंकार का अटल सत्य: मैं और 'तू' के बीच भ्रम रेखा”

🔥 अहंकार का अंधकार: मैं और 'वो' के बीच की नरपिशाची रेखा 🔥 ॐ कार्मिक । आरंभ । 🔥 मैं कौन हूँ? मैं क्यों हूँ? - ख़ुद से पूछें ✍️ आत्मगुरु से जीवन दर्शन ॐ सूत्र वाक्य: “अहंकार अविद्या का प्रारंभ बिंदु और आत्मज्ञान का अंत है।” 🔱 अहंकार का अंत: महाकाल का तात्विक दर्शन 🔱 शिव सरीखा न कोई, शिव की माया में सब सरिया। शंकर वो सहिया, जहाँ काल भी मौन धारिया। (यह सूत्र यह दर्शाता है कि सत्य की चेतना ही वह अंतिम शक्ति है जो जीवन के हर विष और काल के हर भ्रम को सहकर भी अमर रहती है।) [प्रस्तावना] भ्रम की छाया से सत्य की ओर हम पीढ़ियों से एक भ्रम की छाया में जी रहे हैं, जहाँ हमने **आत्मविश्वास** और **अहंकार** को एक ही यात्रा के दो छोर मान लिया है। लेकिन अटल सत्य यह है कि **आत्मविश्वास (आत्मा और विश्वास का मिलन)** स्वयं अहंका...

"मन का दावानल: भीतर के विद्रोह से 'चेतना' और कर्मयोगी के संवाद का अखंड सत्य"

  🔥 मन का दावानल: भीतर के विद्रोह से चेतना का संवाद भीतर का दमन और निष्काम कर्म का उदय   🔥 ॐ कार्मिक । आरंभ । 🔥 मैं कौन हूँ? मैं क्यों हूँ? - ख़ुद से पूछें ✍️ आत्मगुरु से जीवन दर्शन **ॐ सूत्र वाक्य:** "जब लोहा लोहे को पीटता है तब आग उबलती है। वहीं आग की भट्ठी से तपकर एक शस्त्र का जन्म होता है। जब भीतर विद्रोह होता है तब मौन साधना शस्त्र बन जाता है, आशा उसकी धार बन जाती है।" 🌋 भीतर का दमन: असत्य सिद्धांतों का जुल्म लोग बाहरी दमन गुज़ारते हैं, पर हमने **भीतर दमन** गुज़ारा। हम बाहरी बुज़दिल थे, पर भीतर से दमनी। मैंने मन पर बहुत ज़ुल्म किए, उसे **आशा की बेड़ियों** में जकड़कर रखा। बुद्धि को शराफ़त के धागे में पिरो दिया। अरमानों को सिद्धांतों की काल कोठरी में कैद कर दिया। इच्छा का गला घोटा और विचारों को मूल्यों के धागे से बाँध दिया। क्या यह सही था या गलत? इस...