"माया का हास्य और कर्मों का रुदन: विवशता के मार्ग पर चेतना की परीक्षा"
🌌 अंधेरी रात का आह्वान (भाग 2) 📖 આ લેખ ગુજરાતીમાં વાંચો (Read in Gujarati) भाग 2: विवशता का मार्ग और अग्नि-परीक्षा अब मैं थोड़ा स्वस्थ हुआ। मैंने एक हाथ में दीपक जलाया और दूसरे हाथ में लाठी ली, और उस दिशा की ओर चल पड़ा। आवाज़ बहुत दूरी से आ रही थी, सड़कें विकराल थीं और हर कदम पर अनिश्चितता थी। मैं जानता था कि **"यह राह आखिरी भी हो सकती है और जीवन की शुरुआत भी।"** फिर मेरे लिए जीवन में आखिरी में बचा ही क्या था? मैं पसीने से स्नान कर रहा था; मेरे दिल की गहराइयों में एक डरावना खौफ़ था। लेकिन मैं अपने विचारों और आत्मा के सामने विवश नहीं था—बल्कि **समर्पित** था। मैं धीरे-धीरे उस दिशा में एक-एक कदम रख रहा था। **करुणा और माया का द्वंद्व** आवाज़ धीरे-धीरे स्पष्ट सुनाई देने लगी। आवाज़ में मिश्रण था: एक बूढ़ी औरत का करुण रुदन और छोटे-छोटे बालकों की चीखें। यह रुदन इतना भयानक और करुण था कि मेरी सारी विपत्तियाँ उसके सामने फीकी पड़ रही थीं।...