"मौन, रूपांतरण और जागृति: मैं मर भी नहीं सकता, जी भी नहीं सकता"
जलना ही संभव है, उसी राख से है उगना | आत्म-दर्शन और बोध 🔥 ॐ आत्म-बोध सूत्र । आरंभ । 🔥 अहंकार के जलने के बाद भीतर क्या शेष बचता है? — ख़ुद से पूछें ✍️ गुरु आत्माराम से जीवन दर्शन मैं मर भी नहीं सकता, क्योंकि अब अंधा नहीं। जी भी नहीं सकता, क्योंकि अब अज्ञानी नहीं। जलना ही संभव है— उसी राख से उगना। १. मैं मर भी नहीं सकता, क्योंकि अब अंधा नहीं। अज्ञानता की अवस्था में मनुष्य जीवन को केवल वैसा ही देखता है, जैसा वह बाहर से दिखाई देता है। दुःख मिला तो दुःख को कोसता है, विपत्ति आई तो भाग्य को, और जब परिस्थितियों का बोझ बढ़ता है, तो जीवन को ही अपना शत्रु मान लेता है। इंसान उस बोझ को लेकर जीवन भर भागता रहता है—कभी अतीत से, कभी दुःख से, कभी समाज से, और कभी स्वयं अपने आप से।• लेकिन जब भीतर वि...