"अंधेरी रात का आह्वान: किसान से कर्मयोगी तक का पहला कदम"

 

🌌 अंधेरी रात का आह्वान: जब चेतना ने कर्मयोगी को पुकारा

भाग 1: अनिश्चितता की दस्तक (खेती से खोज की ओर)

कुछ दिन पहले की बात है। जीवन में जब अघटित घटनाएँ घटती हैं, तो यह संकेत होता है कि एक नया मोड़ आने वाला है। मेरे साथ भी एक अघटित घटना घटी। **उसने पहले मुझे तोड़ा, फिर मोड़ा और अंततः जोड़ा।** मुझे लगा कि यह घटना मुझे मेरे मित्रों के साथ साझा करनी चाहिए।

मैं एक ग़रीब किसान का बेटा हूँ और किसान होते हुए, रोज़िंदा खेती का कार्य करके परिवार का गुज़ारा चलाता था। उन दिनों मैं दुविधाओं और विपत्तियों से घेरा हुआ था; मेरे विचार अस्थिर थे और मेरा मन प्रकृति के खेल में भटक रहा था। मेरे लिए रात और दिन समान बन गया था:

**घंटा कटता दिन में, दिन कटता वर्ष में।**
**रात बनती युगों की, मुझ पर कौन खाए तरस?**

जीवन में अंधेरा ही अंधेरा था, फिर भी मैं जीवित था—क्योंकि मेरे भीतर प्रकाशमय था। मैं चेतन बल पर अस्तित्व में था। मैं विपत्तियों की आग में जल रहा था। मैं ज़िंदी लाश की तरह जी रहा था, फिर भी मैं भीतर से नहीं टूटा था। सच कहूँ तो मैं विपत्तियों की कठपुतली बन गया था।

**रहस्य की दस्तक**

**अब यह बाहरी घटना है जो मैंने आज तक किसी से साझा नहीं की।**

एक दिन, दिनभर के काम से थककर मैं रात का भोजन करके खेत में एक खट पर घोर निद्रा में सोया था। अचानक, एक विचित्र आवाज़ ने मेरे कानों को बिजली के चमकारे की तरह छुआ और मेरी आँखें खुल गईं।

मैं खाट पर बैठा और चारों दिशा में नज़र डाली तो घोर अंधकार छा गया था। चंद्र सो गया था। सन्नाटा डर पैदा कर रहा था। मैं उस आवाज़ पर ध्यान केंद्रित करने लगा। वह आवाज़ काली रात को चीरती हुई दूर से नहीं, **बल्कि पृथ्वी की गहराइयों से आती हुई प्रतीत हो रही थी।** यह आवाज़ इतनी भयानक थी—जैसे किसी भयंकर युद्ध में बड़े-बड़े महारथियों के बीच एक साधारण योद्धा भयभीत हो जाए। मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे।

मैं मन ही मन सोच रहा था कि सत्य के इतने क़रीब आकर भी, यह नियति मुझे बार-बार क्यों विचलित कर रही है? पर विश्वास था कि कुछ अच्छा और नया होने वाला है। इस भयावहता में कई आवाज़ों का मिश्रण था।

मैंने देखा तो आधी रात के 12 बज कर 10 मिनट का समय चल रहा था। सुनसान वातावरण में पवन देव जैसे जानबूझकर सो गए हों। घोर अंधेरी रात में कुत्तों के भौंकने और बिल्लियों के झगड़ने की आवाज़ें आ रही थीं। मेरे शरीर का एक-एक रोंगटा खड़ा हो गया था।

**जग जोता, जग सोता। सोता सारा संसार। आत्मवेदना आत्म जाने, किससे करे बात?**

**काली अंधेरी रात डाकन डनका करे। तारा टमटमे, चंद्र छुपा अंधकार में।**
**चेतन लगा गहराई में, मन करे भोग।**

लेकिन मेरे लिए हार मानना एक कर्मयोगी के लिए अन्याय होगा। अब मेरा मन उस रहस्य को देखने की इच्छा जता रहा था, वे मेरा दिल भी मन की हाँ में हाँ मिला रहा था, और मेरी आत्मा भी **इस अज्ञात पुकार से पर्दा हटाने के लिए** व्याकुल थी।

**काया बन गई कठपुतली, मन बना रागी।**
**चेतन लगे दर्शन, मैं कौन बने त्यागी?**

चेतन ने मुझे कर्म के सिद्धांतों कि डोर में बाँध कर रखा था। इसी विवशता ने मुझे सत्य की खोज के लिए मजबूर किया था।

अब मैंने एक गहरा श्वास लिया और अपनी सारी शक्तियों को एकत्रित करते हुए, यह भयानक काली अंधेरी रात में उस दिशा में जाने की तैयारी के लिए खड़ा हो गया। **अब मैं पीछे मुड़कर देखने वाला नहीं हूँ। यह दार्शनिक रहस्य को उजागर करके ही रहूँगा।**

👉आगे पढ़ें: माया का हास्य और कर्मों का रुदन... (भाग 2)

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